Friday, 28/2/2020 | 3:02 UTC+0
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निजी अस्पतालों की निगरानी के लिए राजस्थान सरकार अलग नियामकीय संस्था स्थापित करेगी

जयपुर- राजस्थान सरकार अब राज्य में निजी अस्पतालों पर नकेल कसने की तैयारियां कर रही हैं। राज्य सरकार की योजना है कि निजी अस्पतालों की गतिविधियों की निगरानी के लिए एक अलग नियामकीय संस्था स्थापित की जाए। नियामकीय संस्था निजी अस्पतालों द्वारा वसूली जाने वाली फीसों तथा उनके द्वारा उपलब्ध करवाए जा रहे उपचारों आदि सहित सभी गतिविधियों की निगरानी करेगी। वर्तमान में इसके लिए न तो कोई कानून है और न ही ऐसी कोई सरकारी संस्था है जो निजी अस्पतालों द्वारा उपलब्ध करवाए जा रहे उपचारों तथा उनके एवज में वसूली जा रही शुल्कों की राशि आदि की जांच करती हो। हालांकि निजी अस्पतालों की गतिविधियों की निगरानी के लिए प्रावधान रखने वाले क्लीनिकल इस्टब्लिशमैन्ट् ;रजिस्ट्रेशन एण्ड रेगूलेशनद्ध एक्ट को राज्य की विधानसभा वर्ष 2011 में पारित कर चुकी है परन्तु इसके पारित होने के लगभग 8 वर्षों बाद भी राज्य सरकार इसकी अनुपालनाओं को लागू करवाने में असफल रही है। मरीजों को उपलब्ध करवायी जाने वाली सेवाओं तथा सुविधाओं के न्यूनतम मानकों को सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से सभी चिकित्सा सम्बधी संस्थानों का विनियमन करने के लिए उक्त कानून केन्द्र सरकार ने प्रभावी किया था। यह कानून देश के सभी राज्यों में लगभग शैश्व अवस्था में पड़ा है। इसके अन्तर्गत राजस्थान में राज्य सरकार केवल चिकित्सकीय संस्थानों को अस्थायी पंजीकरण देने का काम कर रही है। यह भी तब-जब संस्थान स्वयं इसके लिए आवेदन करते हैं, अन्यथा राज्य में यह एक प्रकार से अनिवार्य नहीं है। हमारे देश में कानून तो बन जाते हैं परन्तु उनकी अनुपालनाओं की बात हमारे शासन-प्रशासन एवं नागरिकों को जंचती नहीं है। इसके लिए आप फार्मेसी अधिनियम-1948, फार्मेसी प्रैक्टिस रेगूलेशन-2015, क्लीनिकल इस्टब्लिशमैन्ट एक्ट आदि को उदाहरण के रूप में रख सकते हैं। राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पिछले दिनों राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हैल्थ सांईसेज मैडीकल कॉलेज से सम्ब( 500 बिस्तरों वाले सरकारी अस्पताल तथा महात्मा गांधी मैडीकल कॉलेज एण्ड हॉस्पीटल में एक कैंसर केयर यूनिट का उद्घाटन करते समय निजी अस्पतालों की निगरानी के लिए एक नयी नियामकीय संस्था स्थापित करने की घोषण की है। उन्होंने निजी अस्पतालों की भूमिका के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा कि सब काम सरकार नहीं कर सकती, सरकार एक संख्या के प्राथमिक, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र तथा ऐसे अन्य संस्थान स्थापित कर सकती है परन्तु बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए निजी अस्पताल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि शिक्षा तथा स्वास्थ्य क्षेत्र विशाल लाभ कमाने का साधन नहीं होना चाहिए। शिक्षा तथा स्वास्थ्य असीमित धन बनाने का माध्यम नहीं है बल्कि लोगों को सेवा उपलब्ध करवाने का माध्यम हैं। सरकार उम्मीद करती है कि निजी अस्पताल बीमार समुदाय को न केवल गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे बल्कि वह मरीजों के लिए उपचार लागत को भी समुचित बनाने का प्रयास करेंगें। गहलोत ने उजागर किया कि निजी अस्पतालों में मरीजों से अधिक राशि वसूले जाने की शिकायतें लगातार मिल रही हैं, इसलिए सरकार की योजना है कि निजी अस्पतालों के लिए एक अलग नियामकीय संस्था बनायी जाए।

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