Friday, 28/2/2020 | 4:03 UTC+0
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मेनिनजाइटिस के उपचार की नकली वैक्सीनों की जब्ती

श्रीगंगानगर- बिहार की मानिन्द राजस्थान में नकली दवाआंे का खेल रूक नहीं रहा है। हालांकि दवाएं सीधे तौर पर मरीजों की जिन्दगी से जुड़ी होती हैं परन्तु नकली दवाओं के धन्धे में संलिप्त सफेदपोश असामाजिक तत्व अपनी अर्थ पिपासा को शान्त करने के लिए बच्चों की जिन्दगी से भी खिलवाड़ करने से परहेज नहीं करते। बीमार होने पर कहां तो मरीज कर्ज लेकर भी दवाओं की खरीद स्वास्थ्य लाभ की चाहत में करता है परन्तु जब दवा के स्थान पर मिट्टी मिलती है तब उस बीमार की हालत कैसी होगी इसका अंदाजा सहज रूप से लगाया जा सकता है। हमारे देश में इंसानियत लगभग खत्म हो चुकी है। अर्थ-पिपासा को शान्त करने के लिए सफेदपोश असामाजिक तत्व कितना निन्दनीय कर्म भी कर सकते हैं इसका भी सहज अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों सनोफी कम्पनी द्वारा बच्चों में दिमागी बुखार के उपचार के लिए प्रयोग में लायी जाने वाली वैक्सीन मैनेस्ट्रा ;एक प्रकार का टीकाद्ध की नकली वैक्सीन बाजार में बिक्री किए जाने की शिकायत राज्य के औषधि नियंत्रण विभाग से की थी। शिकायत पर जांच-पड़ताल की गयी तो अधिकारियों को पता चला कि इस प्रकार के इंजेक्शन राजधानी जयपुर के उपनगरीय क्षेत्र कलवाड़ रोड स्थित वी-क्योर नामक फर्म द्वारा बिक्री किए जा रहे हैं। इस पर अधिकारियों ने फर्म पर छापा मारा और पड़ताल की गयी। वैक्सीन की वायलें छुपा कर रखी हुई थी। फर्म मालिक मनोज पूरे मामले को दबाने की कोशिश करता रहा परन्तु जब फर्म द्वारा प्रस्तुत खरीद-बिक्री के बिलों की जांच की गयी तो सामने आया कि चार वॉयल स्टॉक में है। इसके बाद इन 4 वायलों को निकलवाया गया। जब इन वैक्सीन के लेबल का मिलान कम्पनी की ओरिजनल वॉयल से किया गया तो लेबल व पिं्रटिंग में फर्क नजर आ गया। पूछ-ताछ करने पर मनोज द्वारा बताया गया कि वह जोधपुर में वर्धमान मैडीकल ;जिसका मालिक डॉ. मुनोत हैद्ध से इन्हें खरीदता है। इस पर एक दल को जोधपुर भेजा गया। जोधपुर में फर्म के पास 15 वायलें स्टॉक में मिली। अधिकारियों द्वारा उसकी बिक्री पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। यह दोनों फर्मों की व्यापक जांच करने पर सामने आ सकेगा कि वह नकली वैक्सीन कब से बिक्री कर रहे थे और नकली वैक्सीनों की बिक्री कहां-कहां की जा रही थी। प्रारम्भिक पूछ-ताछ में सामने आने पर राज्य के औषधि नियंत्रक अजय फाटक ने विभागीय अधिकारियों को श्रीगंगानगर में मीरा चौक स्थित सत्यम मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल की जांच करने को कहा। अधिकारियों द्वारा अस्पताल पर छापा मारा गया और अस्पताल से दिमागी बुखार के लिए प्रयोग में लायी जाने वाली वैक्सीन की चार नकली वायलें जब्त की। जांच में अस्पताल की डॉक्टर किरण गर्ग ने बताया कि जोधपुर की फर्म से आठ वैक्सीन खरीदी गयी थी जिस में से चार वैक्सीन दिमागी बुखार से पीड़ित बच्चों में प्रयोग कर ली गयी और चार वैक्सीन अस्पताल के स्टॉक में मौजूद थी। डॉक्टर गर्ग ने जोधपुर की वर्धमान फार्मा से इन्हें खरीदना बताया परन्तु वह इनकी खरीदी का बिल प्रस्तुत नहीं कर सके। इस छापामार दल में औषधि निरीक्षक पंकज जोशी, रामपाल वर्मा तथा श्वेता छाबड़ा शामिल थी। श्वेता छाबड़ा द्वारा अस्पताल के मेडीकल स्टोर में दवाओं की खरीद-बिक्री आदि के बिल व स्टॉक आदि की विस्तृत जांच की गयी। जांच में यह स्पष्ट हो चुका है कि बाजार में ओरिजनल वैक्सीन की कीमत 4950 रूपए है जबकि उक्त फर्मे इन नकली वैक्सीनों को 2100 से 3500 रूपए के मूल्य पर बिक्री कर रही थी। नकली दवा में असरकारक घटक नहीं होता अथवा उसकी मात्रा नगण्य स्तर की होती है। ऐसी कोई दवा मरीज को असर नहीं करती। एक वायल पर हजारों रूपए बचाए जा रहे थे। जानकारी में आया है कि राजस्थान में लगभग 350 वॉयल प्रति माह बाजार में बिक्री होती है। यदि मांग की 20-20 प्र्रतिशत वायलें भी वी-क्योर व वर्धमान मैडीकल द्वारा बेची जा रही थी तो बाजार में प्रतिमाह 40-40 वायलें नकली बेची जा रही थी। जांच में हैरानीजनक तथ्य यह सामने आया है कि कम्पनी का अधिकृत वितरक भी जोधपुर की वर्धमान मैडीकल ही है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सफेदपोश असामाजिक तत्व अपनी अर्थ-पिपासा के लिए कितना निन्दनीय कार्य कर सकते हैं। मेनिनजाइटिस यानि दिमागी बुखार में ज्वर, सिर दर्द, ऐंठन, उल्टी तथा बेहोशी जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। रोगी का शरीर निर्बल हो जाता है, वह प्रकाश से डरने लगता है। कुछ रोगियों की गर्दन में जकड़न आ जाती है। ऐसी हालत मंे ंरोगी को यदि नकली दवा दी जाएगी तो उसकी हालत क्या होगी? यह सोचा जाना चाहिए।

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